पंडित दीनदयाल उपाध्याय के सिद्धांतों पर चलने की आवश्यकता : बलदेव भाई

शिमला, 26 सितंबर ।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानववाद का सूत्र विश्व कल्याण का बड़ा दस्तावेज बन कर उभरा है। इस सूत्र के जरिए उन्होंने मनुष्य जीवन की अवधारणा को बदला और आज के भौतिकवाद के दौर में उनकी शिक्षाओं की नितांत आवश्यकता है। एकात्म मानववाद के विचार आज के युग में भी उतने ही प्रासंगिक है जितने कि उनके काल में थे। यह बात आज प्रदेश विश्वविद्यालय मेें आयोजित एक राष्ट्रीय संगोष्ठि में पांचजन्य के संपादक बलदेव भाई शर्मा ने कही। संगोष्ठि में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. ऐडीएन वाजपेयी और दीनदयाल उपाध्याय पीठ के अध्यक्ष प्रो. सुदेश गर्ग सहित अन्य लोग मौजूद थे।
बलदेव भाई ने अपने संबोधन में कहा कि दीनदयाल उपाध्याय की तत्व दृष्टि भारतीय संस्कृति समग्रतावादी और सार्वभौमिक थी। पंडित जी का विचार था कि व्यक्ति अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए जीए। लेकिन आज दूसरों की परवाह किए बगैर मनुष्य अपने लिए जीता है। पंडित जी के एकात्म मानववाद का सार यही है कि अपनी फिक्र छोडक़र दूसरों के लिए जीना आरंभ करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि आज के समय में भारत में करीब 40 फीसदी लोगों के पास खाने के लिए दो वक्त की रोटी नहीं है। इसका कारण आर्थिक विकास की असंतुलित परिभाषा गढ़ी गई है। दीनदयाल उपाध्याय की अंतोदय परिभाषा को अगर आधार बनाया जाए तो देश फिर सोने की चिडिय़ा बनेगा। उनके सिद्धांतों और जीवन दर्शन का अनुकरण करने से यह संभव है। उन्होंने कहा कि जनसंघ की स्थापना में उनका अहम योगदान रहा और इसका गठन राजनतिक सता पर काबिज होने के लिए नहीं, बल्कि लोगों में राजनीतिक चेतना पैदा करने के लिए किया गया था। पंडित जी के चिंतन और सिद्धांतों की उपेक्षा करने से आज दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं।
दीनदयाल की जीवनी पर प्रकाश डालते हुए बलदेव भाई ने कहा कि छोटी उम्र में ही माता-पिता का साया सिर से उठने के नियति के फैसले को पहचाना और विपरीत परिस्थितियों से निकलकर अपने जीवन को सार्थक बनाया। शिक्षा प्राप्त करते-करते वह संघ के सपंर्क में आए और संघ ने उनकी भूमिका को और गढ़ा। संघ के जीवनव्रती प्रचारक भाऊराव देवरस जैसे महान सेवा व्रती का सान्निध्य उन्हें प्राप्त हुआ। उन्होंने कहा कि उनके जीवन दर्शन और व्यक्तित्व को लेकर देश में कार्य नहीं हुआ है। समाज और राष्ट्र के उन्यन्न में उनके योगदान का प्रचार प्रसार होना आवश्यक है।