लस्सी से नष्ट होगी फफूंदी

चंडीगढ़।
देश-विदेश में हुए वैज्ञानिक अनुसंधानों से पता चला है कि पारम्परिक लस्सी पेय पदार्थ एक श्रेष्ठ फफंूदनाशी है, जिसका उपयोग कृषि विशेषज्ञों की देखरेख में किया जा सकता है, परंतु खेत में छिडक़ने से पहले कुछ पौधों पर इसका परीक्षण जरूरी होता है।
फसलों में फफंूद जनित बीमारियों जैसे गेहूं में पीला रतुआ या यैलो रस्ट, सरसोंं का सफेद रतुआ आदि रोगों से छुटकारा पाने के लिए किसान पांच दिन पुरानी मक्खन निकालने के बाद बच्ची लस्सी के एक प्रतिशत घोल का स्प्रे कपड़े में छानकर पांच से 1० दिन के अन्दर कर सकते हैं। लस्सी को एल्युमिनियम या हंडोलियम या पीतल के वर्तनों में न रखें।
बढ़ते कीटनाशकों और जहरीले यूरेनियम युक्त फास्फेट उरर्वकों के प्रयोग के कारण खाद्य में प्रदूषण का असर बढऩे के साथ-साथ किसानों का खेती का खर्च भी बढ़ रहा है। रासायनिक खेती से देश में लाखों एकड़ जमीन बंजर हो चुकी है। रासायनिक उरर्वकों के कारण न केवल जमीन की उपजाऊ शक्ति कम होती है, बल्कि खेती में कीड़ों और बीमारियों का प्रकोप भी बढ़ता जा रहा है। इसलिए कृषि में कम खर्च वाले प्रदूषण रहित घरेलू प्राकृतिक तरीकों का इस्तेमाल जरूरी हो गया है।
किसान ज्ञान केन्द्र, हिसार के निदेशक श्री सुधीर कुमार कोड़ा ने बताया कि किसान या आमजन किसान ज्ञान केन्द्र की पिछले 1० सालों से चल रही निशुल्क प्राकृतिक कृषि टेलीफोन हैल्प लाइन 0166२-२29१6३ पर फोन करके अपनी खेती या पशुपालन की समस्याओं या पर्यावरण के बारे में या किसी अन्य समस्या या जिज्ञासा का प्राकृतिक समाधान सुबह 1० बजे से शाम 4 बजे तक प्राप्त कर सकते हैं।